राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की सार्वजनिक रूप से सराहना करने के बाद राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह इन दिनों सियासी हलकों में चर्चा के केंद्र में हैं। अपनी ही पार्टी कांग्रेस के भीतर जहां उन्हें इस बयान को लेकर आलोचना और असहजता का सामना करना पड़ रहा है, वहीं भाजपा खेमे में उनका नाम अब सकारात्मक संदर्भ में लिया जाने लगा है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुले मंच से दिग्विजय सिंह को भाजपा में शामिल होने का न्योता देकर सियासी हलचल और तेज कर दी थी। इसी कड़ी में अब राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी दिग्विजय सिंह की तारीफ करते नजर आए हैं।
सोमवार को कैलाश विजयवर्गीय ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए दिग्विजय सिंह की तुलना सीधे देश के पहले गृह मंत्री और ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल से कर दी। उन्होंने लिखा कि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन सच को स्वीकार करने और उसे कहने का साहस हर किसी में नहीं होता। विजयवर्गीय के मुताबिक, आरएसएस की तारीफ कर दिग्विजय सिंह ने यही साहस दिखाया है। उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में खासा चर्चा का विषय बन गया है और इसे सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार से कहीं आगे की टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
यह पहला मौका नहीं है जब कैलाश विजयवर्गीय ने दिग्विजय सिंह की सार्वजनिक रूप से सराहना की हो। 17 दिसंबर को बुलाए गए मध्य प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान भी विजयवर्गीय ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों का जिक्र करते हुए दिग्विजय सिंह की कार्यशैली और राजनीतिक व्यवहार की तारीफ की थी। उन्होंने सदन में कहा था कि राजनीतिक सौजन्यता और संवाद की कला दिग्विजय सिंह से सीखी जानी चाहिए। दिलचस्प बात यह रही कि इस चर्चा के कुछ दिन बाद दिग्विजय सिंह ने भी विजयवर्गीय की तारीफ की थी, जिससे दोनों नेताओं के बीच परस्पर सम्मान की झलक साफ दिखाई दी।
दिग्विजय सिंह का राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त होने जा रहा है, और इसी वजह से उनके हालिया बयानों को सियासी दांव-पेंच से जोड़कर भी देखा जा रहा है। मौजूदा समीकरणों में कांग्रेस अपने कोटे से राज्यसभा में सिर्फ एक सदस्य ही भेज सकती है। ऐसे में पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठ रहा है कि दिग्विजय सिंह का भविष्य क्या होगा। बीते कुछ वर्षों से वह कांग्रेस में अपेक्षाकृत हाशिये पर माने जा रहे हैं और कमलनाथ सरकार गिरने की जिम्मेदारी का अप्रत्यक्ष ठीकरा भी कई बार उनके सिर फोड़ा गया है। शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी केमिस्ट्री भी पहले जैसी मजबूत नहीं दिखती।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन बयानों से भले ही दिग्विजय सिंह के दिल्ली के सियासी गलियारों में नंबर कुछ कम हुए हों, लेकिन उन्होंने उस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, जिसमें नेता सच कहने से पीछे नहीं हटते। कांग्रेस के पुराने दौर में सरदार पटेल और अन्य दिग्गज नेता भी वैचारिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रहित में खुलकर अपनी बात रखते थे। दिग्विजय सिंह के हालिया कदम को इसी राजनीतिक साहस और वैचारिक स्पष्टता के रूप में देखा जा रहा है, जिसने मध्य प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है।