लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को लखनऊ की अदालत से बड़ी कानूनी राहत मिली है। उनकी कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली याचिका को कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि इस तरह की याचिकाओं पर सुनवाई करना न्यायिक समय की बर्बादी है।
नागरिकता तय करना अदालत का काम नहीं
लखनऊ की एमपी/एमएलए कोर्ट में सुनवाई कर रहे एसीजेएम आलोक वर्मा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता वैध है या नहीं, यह तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह पूरी तरह केंद्र सरकार का विषय है। कोर्ट ने माना कि याचिका में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया जा सके।
याचिका को बताया कानून का दुरुपयोग
अदालत ने याचिका को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया। कोर्ट के अनुसार यह मामला केवल किसी व्यक्ति को परेशान करने या न्यायिक प्रक्रिया का अनुचित लाभ उठाने की मंशा से दायर किया गया प्रतीत होता है। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।
आठ दिन चली सुनवाई के बाद आया फैसला
इस मामले में करीब आठ दिनों तक लगातार सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने सभी दलीलों को सुनने के बाद अंततः याचिका को खारिज करने का निर्णय लिया।
कई कानूनों के तहत एफआईआर की मांग
याचिकाकर्ता विग्नेश ने राहुल गांधी के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम 1923, पासपोर्ट अधिनियम 1967 और विदेशी अधिनियम 1946 के तहत मामला दर्ज करने की मांग की थी। उनका दावा था कि राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं और इस आधार पर उनकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जानी चाहिए।
याचिकाकर्ता का संविधान का हवाला
याचिकाकर्ता का तर्क था कि भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक साथ दो देशों की नागरिकता नहीं रख सकता। यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार करता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी ने ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था।
मामले की सुनवाई का पूरा सफर
इस मामले से जुड़े कथित सबूत पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय और इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष पेश किए गए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रारंभिक सुनवाई रायबरेली की विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट में शुरू हुई। हाल ही में याचिकाकर्ता ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मामले को लखनऊ ट्रांसफर करने की मांग की थी।
लखनऊ कोर्ट ने लगाई याचिका पर रोक
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि रायबरेली में सुनवाई के दौरान उन्हें अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा है। इसके बाद मामला लखनऊ की एमपी/एमएलए कोर्ट में सुना गया, जहां कोर्ट ने सभी पहलुओं पर विचार करते हुए एफआईआर दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया।