लेखक
चैतन्य भट्ट
मुफ्त धन और सुविधाएं बांटने वाले रेवड़ी कल्चर ( Rewari Culture ) पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर सख्त टिप्पणी की है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि मुफ़्त मिल रहा राशन और पैसा लोगों को काम नहीं करने के लिए प्रेरित कर रहा है। परजीवियों का एक वर्ग बन रहा है और राष्ट्रीय स्तर पर अकर्मण्यता बढ़ रही है। क्या ये बेहतर नहीं होगा कि लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाया जाए और राष्ट्र के विकास में उन्हें योगदान करने दिया जाए ? जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस आर. जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह टिप्पणी शहरी गरीबी उन्मूलन पर हुई सुनवाई के दौरान की। इससे पहले भी दिसंबर 2024 में सरकारी मुफ्त राशन योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कब तक ऐसे मुफ्त राशन बांटा जाएगा ? सरकार रोजगार पैदा क्यों नहीं करती ?
चुनाव में नेताओं को याद आता है Rewari Culture
सुप्रीम कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद आई है। बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों ने चुनाव में मुफ्त योजनाओं ( Rewari Culture ) के वादों की झड़ी लगा दी थी। आप ने हर महिला को 2,100 रुपये मासिक सहायता वाली महिला सम्मान योजना, पानी बिल माफी, छात्रों के लिए मुफ्त बस यात्रा और मेट्रो किराए में 50त्न छूट का वादा किया था। वहीं बीजेपी ने महिलाओं को 2,500 रुपये मासिक सहायता, होली और दिवाली पर मुफ्त गैस सिलेंडर देने जैसे वादे किये थे। दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और हरियाणा में भी पार्टियों ने इसी तरह फ्री रवडिय़ों के वादे किए थे। इन राज्यों में बीजेपी को जीत भी मिली।कर्नाटक में कांग्रेस ने मुफ्त बिजली, अनाज और बस यात्रा का ऑफर दिया था तो हरियाणा में भाजपा ने महिलाओं को 2100 रुपये भत्ता देने का ऐलान कर बहुमत में सरकार बनाई थी. महाराष्ट्र में 2024 में भाजपा ने लाडकी बहिन योजना के तहत 1500 रुपये देने का ऐलान किया था और भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी।
फ्रीबीज योजनाओं का लंबा इतिहास रहा है। इनकी शुरुआत सबसे पहले मद्रास यानी आज के तमिलनाडु में के कामराज ने की थी। 1954 से 1963 तक सत्ता में रहे
कामराज ने मुफ्त शिक्षा और मुफ्त भोजन का प्लान बनाया था। 1967 में तमिलनाडु में अन्नादुरई ने 4.5 किलो मुफ्त चावल हर किसी को देने का ऐलान किया था। 2006 में अन्नाद्रमुक ने रंगीन टीवी की पेशकश की थी तो प्रमुख विपक्षी डीएमके ने रंगीन टीवी के साथ केबल कनेक्शन भी ऑफर कर दिया था। दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा 2015 में सरकार बनाने में सफलता का सेहरा भी उसके द्वारा किए गए मुफ्त पानी, बिजली के सर बंधा था। अब तो देश में हर चुनाव के वक्त मुफ्त योजनाओं की झड़ी लग जाती है। कोई बिजली-पानी मुफ्त देता है तो कोई नगद सहायता का ऐलान कर देता है। अगस्त 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा था कि जो फूड गोदामों में अनाज सड़ रहा है उसे जनता में बांटिए। उस समय फूड मंत्रालय देख रहे शरद पवार ने विरोध किया तो कोर्ट ने आदेश दिया कि सडऩे से अच्छा है इसे बांटिए।
ऐसी रेवड़ी योजनाएं निरंतर राज्यों के खजाने पर बोझ बढ़ा रही हैं मगर इनके हाथ में सत्ता की चाबी कुछ इस तरह आ गई है कि कर्ज से गले तक डूबे राज्यों में भी चुनाव आने पर नई मुफ्त योजनाओं का ऐलान हो जाता है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक,तेलंगाना, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, झारखंड और हरियाणा जैसे राज्य अपने सकल घरेलू उत्पाद का एक से सवा दो प्रतिशत तक इन योजनाओं पर खर्च कर रहे हैं जो कुल मिलाकर तीन लाख करोड़ रूपए से भी अधिक बैठता है।
गले में घंटी कौन बांधे ?
सवाल यही है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? कोई राजनीतिक दल इन योजनाओं को खत्म करने की हिम्मत जुटाने की स्थिति में नहीं है। वोट की लालसा में ऐसी योजनाएं शुरू तो हो जाती हैं लेकिन वापस लेना मुश्किल हो जाता है। सत्तारूढ़ दल समीक्षा की बात करे तो विपक्षी बयानबाजी शुरू कर देते हैं। सरकार को गरीब विरोधी ठहराया जाने लगता है और खजाने पर बोझ लगातार बढ़ता जाता है।
वस्तु एवं सेवा कर की केंद्रीय व्यवस्था आने के बाद राज्य सरकारों के वित्तीय स्त्रोत सीमित रह गए हैं। केंद्र सरकार की मुफ़्त सहायता वाली किसान सम्मान निधि, मुफ़्त राशन जैसी अपनी योजनाएं हैं जिनके लिए निरंतर धन की आवश्यकता है।
तमाम प्रयासों के बावजूद औद्योगिक प्रगति की रफ़्तार दम नहीं पकड़ रही। अमेरिका में ट्रंप के सत्ता में आने के बाद वैश्विक व्यापार टैरिफ वृद्धि की अनिश्चित संभावनाओं से जूझ रहा है। पिछले केंद्रीय बजट से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि वित्तीय संसाधनों की कमी का खामियाजा अंतत: सार्वजनिक महत्व की अधोसंरचनात्मक परियोजनाओं पर पडऩा तय है। दूसरी ओर राजनीतिक मजबूरी बन चुकी रेवड़ी कल्चर की यह बयार रुकने वाली नहीं है। निष्कर्ष साफ़ है, मुफ़्त का चंदन को घिसने वाली इन परियोजनाओं की कीमत हमें विकास और रोजगार के अवसरों में कमी के रूप में ही उठाना पड़ेगी।