सड़क सुरक्षा: केवल कानून से नहीं, संस्कारों से थमेगी रफ्तार; घर को बनाना होगा पहला ‘प्रशिक्षण केंद्र’

Road safety: भारत में सड़क दुर्घटनाओं को अक्सर खराब बुनियादी ढांचे या पुलिस की कमी का परिणाम मान लिया जाता है। सरकारें कैमरों और भारी चालान के जरिए समाधान खोज रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जब तक सड़क सुरक्षा ‘ड्राइंग रूम’ की चर्चा और पारिवारिक संस्कारों का हिस्सा नहीं बनेगी, तब तक सड़कों पर मौत का तांडव कम नहीं होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि 5 से 29 वर्ष के युवाओं में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण सड़क दुर्घटनाएं हैं। यह स्पष्ट करता है कि यह केवल परिवहन की समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।

सोशल लर्निंग: माता-पिता हैं असली ‘रोल मॉडल’

मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडुरा की ‘सोशल लर्निंग थ्योरी’ का हवाला देते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के आचरण से सीखते हैं। जब एक पिता अपने बच्चे के सामने ‘शॉर्टकट’ के लिए गलत दिशा (रॉन्ग साइड) में गाड़ी चलाता है या हेलमेट को केवल पुलिस से बचने का जरिया बताता है, तो वह अनजाने में बच्चे को कानून तोड़ने का पहला पाठ पढ़ा रहा होता है।

सड़क पर दिखने वाली लापरवाही अक्सर घरेलू स्वीकृति प्राप्त लापरवाही” का परिणाम होती है। नीति-निर्माताओं के लिए यह एक असहज सच है कि प्रशासन सजा तो दे सकता है, लेकिन संस्कार नहीं।

नीति में बदलाव की दरकार: फाइल से बाहर निकले सुरक्षा

वर्तमान सड़क सुरक्षा नीतियों की सीमाएं अब स्पष्ट होने लगी हैं। लेख के अनुसार, सड़क सुरक्षा को केवल परिवहन विभाग की फाइलों तक सीमित रखना एक बड़ी भूल है। इसे अब निम्नलिखित क्षेत्रों के साथ जोड़ना अनिवार्य है:

  • शिक्षा और स्वास्थ्य: स्कूलों में केवल नियम रटाने के बजाय व्यवहार परिवर्तन पर जोर।

  • अभिभावक हस्तक्षेप: ऐसे सरकारी अभियान जो माता-पिता को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराएं।

  • सांस्कृतिक सुधार: समाज में ‘नियमों के पालन’ को ‘मजबूरी’ के बजाय ‘गर्व’ के रूप में स्थापित करना।

दोहरे मापदंड: सबसे बड़ी चुनौती

समाज में व्याप्त विरोधाभास बच्चों के दिमाग पर गहरा असर डालता है। जब घर के भीतर आदर्श बातें की जाती हैं, लेकिन सड़क पर अपनी सुविधा के अनुसार नियम तोड़े जाते हैं, तो नई पीढ़ी यह सीखती है कि “नियम आदर्श नहीं, बल्कि परिस्थिति-आधारित होते हैं।” यही वह बिंदु है जहां सरकारी अभियानों की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है।

“बेहतर सड़कें और सख्त कानून जरूरी हैं, लेकिन वे तब तक पर्याप्त नहीं होंगे जब तक हर परिवार खुद को एक प्रशिक्षण केंद्र और हर माता-पिता खुद को एक प्रशिक्षक नहीं मानेंगे।”

प्रशासनिक नहीं, नैतिक चुनौती

समय आ गया है कि हम सड़क सुरक्षा को केवल एक प्रशासनिक समस्या मानना बंद करें। यह एक सांस्कृतिक और नैतिक चुनौती है। कानून और चालान सड़क पर अनुशासन ला सकते हैं, लेकिन सुरक्षा की गहरी भावना घर के भीतर से ही पैदा होगी। अंततः, सड़क पर दिखने वाली हमारी आदतें नीति की फाइलों से नहीं, बल्कि हमारे घर के दरवाजों से निकलती हैं।