हिंदू धर्म में माघ महीने का विशेष महत्व है और इस माह में पड़ने वाली सकट चौथ को संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में गिना जाता है। वर्ष 2026 में भी यह पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इसे संकष्टी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ और माघी चौथ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकट चौथ के व्रत को बिना कथा पढ़े या सुने अधूरा माना जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है और उन्हें तिल व गुड़ से बने ‘तिलकूट’ का भोग लगाया जाता है। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
सकट चौथ की पौराणिक कथा
इस व्रत से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा एक कुम्हार और एक बुढ़िया माई की है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन पकाने के लिए आंवा (भट्ठा) लगाया, लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी उस आंवे में बर्तन नहीं पक रहे थे। परेशान होकर वह राजा के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई।
राजा ने राज्य के राजपुरोहित से परामर्श किया। राजपुरोहित ने उपाय बताया कि यदि इस आंवे में किसी बच्चे की बलि दी जाए, तो बर्तन पक जाएंगे। राजा के आदेश पर राज्य में बलि के लिए बच्चे की तलाश शुरू हुई। अंत में, एक गरीब बुढ़िया के बेटे को चुना गया। उस बुढ़िया का वही एक सहारा था और जिस दिन उसके बेटे की बलि दी जानी थी, उस दिन सकट चौथ का व्रत था.
गणेश जी की कृपा और चमत्कार
बुढ़िया ने अपने बेटे को सकट की सुपारी और दूब देकर कहा कि भगवान गणेश तुम्हारी रक्षा करेंगे। उसने बेटे को आंवे में बैठा दिया और खुद भगवान गणेश की पूजा-अर्चना में लीन हो गई। बुढ़िया ने पूरी रात गणेश जी से अपने पुत्र की रक्षा की प्रार्थना की।
अगली सुबह जब कुम्हार ने आंवा देखा तो वह हैरान रह गया। आंवे के बर्तन तो पक गए थे, लेकिन बुढ़िया का बेटा पूरी तरह सुरक्षित और जीवित था। इतना ही नहीं, उस आंवे में रखे अन्य बर्तन भी सोने के हो गए थे। यह चमत्कार देखकर पूरे नगर में भगवान गणेश की महिमा का गुणगान होने लगा।
व्रत का महत्व और परंपरा
इस घटना के बाद से ही माघ कृष्ण चतुर्थी को सकट चौथ के रूप में मनाने की परंपरा और दृढ़ हो गई। ऐसा माना जाता है कि जो भी माताएं इस दिन सच्चे मन से गणेश जी की पूजा करती हैं और यह कथा सुनती हैं, उनकी संतान पर आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं।
पूजा के दौरान तिल और गुड़ का प्रसाद (तिलकूट) चढ़ाया जाता है। कई स्थानों पर शकरकंद और गुड़ का भी भोग लगाने की परंपरा है। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है।