मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में गर्मी से पहले ही पानी की किल्लत बढ़ने लगी है। आदिवासी बहुल गांवों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इससे पेयजल योजनाओं के नलकूप सूख रहे हैं और कई जगह जलापूर्ति बाधित हो रही है। बीते एक महीने में अलग-अलग इलाकों में ग्रामीण तीन से अधिक बार सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर चुके हैं। स्थानीय स्तर पर इसे मौसमी नहीं, संरचनात्मक संकट के रूप में देखा जा रहा है।
स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि अभी तापमान का चरम दौर शुरू नहीं हुआ है। कई गांवों में हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है। जिन योजनाओं का आधार बोरवेल थे, वे रुक-रुककर चल रही हैं। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को कई स्थानों पर आनन-फानन में नई बोरिंग करानी पड़ रही है। विभाग का कहना है कि समस्या कुछ गांवों तक सीमित है, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभावित बस्तियों की संख्या बढ़ने की बात सामने आ रही है।
भीमगढ़ बांध में गिरावट ने बढ़ाई चिंता
सिवनी के लिए महत्वपूर्ण संजय सरोवर भीमगढ़ बांध का जलस्तर भी तेज गति से घट रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 14 फरवरी को बांध का स्तर 511.90 मीटर था, जो 27 फरवरी तक 510.30 मीटर पर आ गया। यानी 13 दिनों में 1.60 मीटर की कमी दर्ज हुई। अधिकारियों ने प्रतिदिन औसतन 15 सेंटीमीटर पानी घटने की जानकारी दी है। यह गिरावट आगे की गर्मी को देखते हुए पेयजल प्रबंधन पर दबाव बढ़ा सकती है।
पिछले साल नहरों के जरिए सिंचाई के लिए अधिक पानी छोड़े जाने का असर शहर की पेयजल आपूर्ति पर पड़ा था। उस अनुभव के बाद इस बार सिंचाई विभाग का दावा है कि पहले पेयजल के लिए पर्याप्त पानी सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही किसानों को भी सिंचाई पानी उपलब्ध कराया जाएगा। जल प्रबंधन में यही संतुलन आने वाले महीनों की स्थिति तय करेगा।
डार्क जोन में बढ़ता भूजल दोहन
सिवनी, लखनादौन, बरघाट समेत जिले के कई विकासखंडों को भूजल उपलब्धता की स्थिति के कारण डार्क जोन में रखा गया है। इसके बावजूद नलकूप खनन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा। ग्रामीण इलाकों में निजी और सार्वजनिक दोनों स्तरों पर तेजी से बोरिंग होने की बात सामने आई है। भूजल के लगातार दोहन से रिचार्ज क्षमता और मांग के बीच अंतर बढ़ रहा है। इसका सीधा असर पेयजल योजनाओं पर पड़ रहा है।
कई गांवों में पारंपरिक और मौजूदा जल स्रोत सूखने से योजनाएं बंद होने की स्थिति तक पहुंच गई हैं। इससे महिलाओं और बुजुर्गों पर पानी लाने का दबाव बढ़ा है। गांवों में टैंकर निर्भरता की आशंका भी बढ़ रही है, हालांकि प्रशासन ने अभी बड़े पैमाने पर टैंकर आपूर्ति की घोषणा नहीं की है। फिलहाल तात्कालिक समाधान नए बोरवेल पर केंद्रित है, जिसे विशेषज्ञ लंबे समय का विकल्प नहीं मानते।
पिछले साल शहर में 15 दिन का संकट रहा था
जिला मुख्यालय में पिछले वर्ष वैनगंगा नदी का जलस्तर घटने से करीब 15 दिनों तक पेयजल संकट बना रहा था। उस समय माचागोरा की पेंच परियोजना से पानी छोड़े जाने के बाद शहर में आपूर्ति सामान्य हो सकी थी। यह घटना प्रशासनिक रिकॉर्ड में ताजा संदर्भ के रूप में मौजूद है और इस साल की रणनीति पर उसका असर भी दिख रहा है।
कई वर्षों से जिले को जल अभावग्रस्त घोषित करने की प्रक्रिया चलती रही है। इस वर्ष भी मार्च 2026 में इसी संबंध में कार्रवाई आगे बढ़ाने की तैयारी बताई गई है। विभाग का कहना है कि संकटग्रस्त गांवों में तत्काल व्यवस्था और दीर्घकालिक संरचना दोनों पर काम किया जाएगा।
सतही जल आधारित योजनाओं पर जोर
पीएचई और जल निगम के बीच समन्वय के तहत जिले के सभी गांवों को सतही जल आधारित पेयजल योजनाओं से जोड़ने की दिशा में काम जारी है। आधिकारिक दावे के मुताबिक करीब 50 प्रतिशत गांवों को ऐसी योजनाओं से कवर किया जा चुका है। शेष 50 प्रतिशत गांवों के लिए परियोजनाएं तैयार करने के निर्देश शासन स्तर से जारी हुए हैं। प्रशासन का मानना है कि भूजल आधारित मॉडल से बाहर निकले बिना स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।
“भू-जल स्तर गिरने के कारण जिले के कुछ गाँव में पेयजल योजना प्रभावित हुई है। मार्च माह में जिले के जल अभावग्रस्त घोषित करने आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। सतही जल पर आधारित जल निगम की योजना से जिले के 50 प्रतिशत गांव को कवर किया जा चुका है। शेष 50 प्रतिशत गांव के लिए परियोजनाएं तैयार करने के निर्देश शासन स्तर से जल निगम को जारी किए गए हैं, ताकि समस्या का स्थायी समाधान हो सके।” — नरेश कुवाल, कार्यपालन अभियंता, पीएचईडी, सिवनी
फिलहाल सिवनी में संकेत साफ हैं कि गर्मी के आगे बढ़ने के साथ चुनौती बढ़ सकती है। बांध स्तर, भूजल गिरावट और पेयजल योजनाओं की विफलता एक साथ दबाव बना रहे हैं। अगले कुछ हफ्तों में आपूर्ति प्रबंधन, भूजल नियंत्रण और सतही जल योजनाओं की प्रगति ही तय करेगी कि संकट सीमित रहेगा या व्यापक रूप लेगा।