लेखक
चैतन्य भट्ट
यह अनुभव सब की जिंदगी में आया होगा। जल्द कहीं पहुंचना है मगर ट्रैफिक वीआईपी ( VIP ) के लिए रुका है। स्कूल बसें और यहां तक कि गंभीर मरीजों को लिए एंबुलेंसे तक इंतजार कर रही हैं। मंदिर में दर्शन के लिए कतार में हैं,और नेता बेधडक़ आगे बढ़ता चला जा रहा है। यह वीआईपी संस्कृति की दुखदाई छवियां हैं। नेता,नौकरशाह और कितनी ही अन्य श्रेणियों के लोग विशेष व्यवहार का आनंद लेते हैं और आम आदमी को छोटा और महत्वहीन महसूस कराते हैं।
VIP कल्चर की ऐसे हुई शुरुआत
वीआईपी ( VIP ) कल्चर की जड़ें औपनिवेशिक युग में बनीं जब अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए अभिजात्यों का एक अलग वर्ग तैयार किया। आजादी के बाद यह परंपरा बहुत दिनों तक खत्म सी रही। मंत्री तो छोडि़ए, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक बिना सुरक्षा जनता जनार्दन से घिरे नजर आ जाते थे। स्व. प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की कार के साथ सिफऱ् एक अतिरिक्त कार चलती थी और सडक़ पर चलने वालों के लिए ये देखना आम था कि वे अपनी कार में फ़ाइलें पढ़ते हुए जा रहे हैं। मगर सत्तर के दशक में अचानक लौटी यह संस्कृति अब शवाब पर है। मोदी सरकार ने 2017 में इसे खत्म करने की पहल की थी। नितिन गडकरी ने अपनी लाल बत्ती तत्काल निकाल फेंकी थी। मगर इस सराहनीय पहल ने वीआईपी पहलवानों के आगे दम तोड़ दिया। नेताओं ने धीरे धीरे इसे सुरक्षा से जोड़ दिया और गनमैन प्रतिष्ठा की पहचान बन गए। वोट के लिए गली कूचों में बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के घूमने वाले नेता चुनाव जीतते ही क्यूं इतनी सुरक्षा के पीछे छिपने लगते हैं, शोध का विषय है। स्वीडिश प्रधानमंत्री ओलेफ़ पाम की सिनेमा हॉल से पैदल लौटते समय हत्या हो गई थी। सितंबर 2003 में ही स्वीडिश विदेश मंत्री अना लिंड को भी खऱीदारी करते हुए एक शख्स ने चाकू मार दिया था। इसके बावजूद महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर इन विकसित देशों में कोई जुनून नहीं देखा जाता।
नेताओं की सादगी के उदाहरणों से दुनिया भरी पड़ी है। डच प्रधानमंत्री मार्क रेते अपने घर से दफ़्तर साइकिल से जाते रहे हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की कार लंदन की ट्रैफिक़ लाइट पर रुक कर बत्ती हरी होने का इंतज़ार करते पाई गई है। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अपने प्रधानमंत्रित्व काल के आखऱिी दिन खुद अपने हाथों से ट्रक पर अपना टेलीविजऩ लादते देखे गए थे। भारत में इस बात की कल्पना भी असंभव है। सार्वजनिक धन से बने राजमार्गों के टोल गेट पर सूचना टंगी रहती है कि भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और कनिष्ठ मंत्रियों को टोल शुल्क से छूट है। कारण संबंधी कोई स्पष्ट तर्क नहीं है। बस वीआईपी संस्कृति की एक विशिष्ट मान्यता है। टोल से निकलने में वरीयता तक ठीक है मगर भुगतान में छूट क्यों ? उचित यही होता कि सभी टोल का भुगतान करते या किसी को भी नहीं करना पड़ता।वीआईपी स्टेटस की यह दीवानगी मंदिरों में भी बदस्तूर जारी रहती है जहां इसका विचार मात्र भी देवत्व के खिलाफ है। साधारण भक्तों के साथ धक्का-मुक्की होती है जबकि ‘वीआईपी’ को दर्शन और तस्वीरें लेने के लिए समय दिया जाता है। महाकुंभ में भी यह संस्कृति हावी रही। कितने ही धर्मस्थलों में भगवान के वीआईपी दर्शन खरीदे जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ दायर याचिका में दलील दी गई थी कि वीआईपी दर्शन शुल्क लेकर देवता तक जल्दी पहुंचने की सुविधा समानता के सिद्धांत और वंचित वर्गों के साथ अन्याय है। कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में मंदिर प्रशासन और समाज को ही निर्णय लेना चाहिए। यह जरूर कहा कि ऐसी सुविधा नहीं होनी चाहिए।
नेताओं के अलावा नौकरशाह, जज, सैनिक अधिकारी और यहाँ तक कि फि़ल्म कलाकार भी वीआईपी स्टेटस पाने की होड़ में शामिल हैं। अमिताभ बच्चन, आमिर खान, अक्षय कुमार और अनुपम खेर को ङ्ग सिक्योरिटी हासिल है। सलमान खान को ङ्घ+ तो अंबानी परिवार र्को ं+ श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। सिक्योरिटी देने के मापदंड भिन्न हैं। आईबी या लोकल एजेंसी की रिपोर्ट पर सुरक्षा मिलती है। राज्य तो इन मापदंडों की परवाह भी नहीं करते। खतरा हो या नहीं रसूख के बल पर सुरक्षा मिल जाती है। आम आदमी के लिए भले पुलिस बल की कमी हो मगर नेता के काफिले के लिए पुलिस कर्मी इफरात में उपलब्ध रहते हैं। 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक के सालाना खर्च पर लगभग 20 हजार वीआईपी सुरक्षित रहते हैं। सिर्फ दिल्ली में ही करीब 9 हजार जवान वीआईपी सुरक्षा में तैनात हैं। विडंबना यह है कि यह सारा खर्च भेदभाव का शिकार होने वाला आम आदमी ही उठाता है।
यह वीआईपी संस्कृति समानता की मूल संवैधानिक अवधारणा के खिलाफ है और सच कहें तो लोकतंत्र पर धब्बा है। लोगों में अलगाव और आक्रोश की भावना पैदा करती है। बदलाव के इस युग में हमें एक मानवीय और समतावादी समाज की आवश्यकता है, जो विशेष लोगों का ही नहीं सभी नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करे। वीआईपी संस्कृति के प्रतीकों और प्रथाओं को खत्म करने और यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस सरकारी कदम उठाए जाने चाहिए ताकि सार्वजनिक सेवाएं सभी नागरिकों के लिए सुलभ और उत्तरदायी हों और पारदर्शिता, जवाबदेही व कानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध हों। वीआईपी स्टेटस के प्रति नेताओं की दीवानगी देखकर कोई उम्मीद तो नहीं जगती। शीर्ष नेतृत्व ही कुछ ठोस पहल करे तो शायद बात बने।