मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के आधा दर्जन गांवों में होली से जुड़ी एक पुरानी परंपरा आज भी कायम है। इन गांवों में न तो होली का डांडा गाड़ा जाता है और कई जगह होलिका दहन भी नहीं होता। स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक यह परंपरा गांवों के बीच पुराने वर्चस्व संघर्ष से जुड़ी है, जो दशकों पहले शुरू हुई थी और अब सामाजिक स्मृति का हिस्सा बन गई है।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले होली का डांडा गाड़ने के बाद आसपास के गांवों में खुला ऐलान किया जाता था। ऐलान में कहा जाता था कि तय दिन पर दूसरे गांव का डांडा उखाड़कर ले जाया जाएगा। इसके बाद समूह बनाकर पुरुष ढोल-नगाड़ों के साथ निकलते थे और जिस गांव को निशाना बनाया जाता, वहां से डांडा उखाड़कर अपने गांव ले आते थे।
यह सिर्फ प्रतीकात्मक रस्म नहीं मानी जाती थी। जिस गांव के लोग अपना डांडा बचा नहीं पाते, उस गांव की होली को सूनी मान लिया जाता था। ऐसे गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता था। परंपरा के अनुसार जब तक डांडा उसी तरीके से वापस नहीं लाया जाता, तब तक गांव की होली अधूरी मानी जाती थी।
वर्चस्व की परंपरा और उससे बने स्थानीय नियम
स्थानीय स्तर पर यह मान्यता रही कि डांडा बचाना गांव की सामूहिक ताकत का संकेत है। इसी वजह से डांडा उखाड़ने और बचाने की तैयारी पहले से होती थी। विरोध होने पर कई बार छीना-झपटी और मारपीट तक की स्थिति बनती थी। ग्रामीणों के मुताबिक इस संघर्ष में कुछ लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए। बाद के वर्षों में कई गांवों ने टकराव से बचना शुरू किया, लेकिन डांडा खोने का सामाजिक असर बना रहा।
आज भी श्योपुर जिले के बगहुआ, दूनी सीसवाली, दलारना और तिल्लीपुर जैसे गांव अपने पुराने डांडे वापस नहीं ला पाए हैं। इसी कारण इन गांवों में करीब 73 साल से होली का डांडा नहीं गाड़ा जाता। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा सिर्फ एक घटना से नहीं, बल्कि कई पुराने गांव-स्तरीय विवादों से बनी और समय के साथ नियम की तरह चलती रही।
73 साल पुरानी घटना अब भी याद
ग्रामीणों के मुताबिक कुछ गांवों में यह सिलसिला खास घटनाओं से जुड़ा है। पुराने स्थानीय संदर्भ में बताया जाता है कि करीब 73 साल पहले पड़ोसी बगडुआ गांव के लोग चरों गांव का डांडा उखाड़कर ले गए थे। इस घटना के बाद से वहां होलिका दहन बंद हो गया और परंपरा उसी रूप में आगे बढ़ती रही।
ग्रामीण यह भी कहते हैं कि उस दौर में गांवों के बीच प्रतिस्पर्धा खुलकर दिखती थी। पहले घोषणा होती थी, फिर समूह जाता था, और डांडा उखाड़कर लाने को प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था। जिन गांवों का डांडा चला जाता, वहां अगले वर्षों में भी होली की वही स्थिति बनी रहती थी। कई गांवों में तो होली जलाई ही नहीं जाती, जबकि आसपास के गांवों में उत्सव सामान्य ढंग से चलता है।
“वर्चस्व की लड़ाई के लिए पहले पड़ोस के ग्रामीण एलान करके एक-दूसरे के गांव से होली के डांडे उखाड़कर ले जाया करते थे। वे जिन गांवों से डांडे उखाड़कर ले जाते थे, उन गांवों में आज भी होली का डांडा नहीं गाड़ा जाता। कई गांवों में तो होली ही नहीं जलाई जाती है। वर्षों पुरानी यह परंपरा जिले के कई गांवों में आज भी निभाई जा रही है।” — भीमसिंह जाट, ग्रामीण
“बगडुआ गांव के ग्रामीण हमारे गांव के होली के डांडे को वर्षों पहले उखाड़कर ले गए थे। तब से हमारे गांव में होलिका दहन नहीं होता, जबकि आस-पड़ोस के गांवों में होलिका दहन बड़े धूम-धाम से किया जाता है।” — दिलखुश मीणा, ग्रामीण
ग्रामीणों की मानें तो यह परंपरा अब टकराव की जगह स्मृति और सामाजिक नियम के रूप में बची है। होली के मौके पर जब आसपास के गांवों में तैयारियां तेज होती हैं, तब इन गांवों में पुरानी घटनाएं फिर चर्चा में आ जाती हैं। श्योपुर के इन गांवों का मामला बताता है कि स्थानीय इतिहास कई बार त्योहारों की वर्तमान परंपराओं को दशकों तक प्रभावित करता है।