टीचर्स के मीम बनाने पर छात्र निष्कासित, सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर स्कूल और MP सरकार से मांगा जवाब

Indore/Delhi: इंस्टाग्राम पर शिक्षकों के मीम साझा करने पर इंदौर के एक प्रतिष्ठित स्कूल से निकाले गए 14 वर्षीय छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी कीमत पर बच्चे की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार, ICSE बोर्ड और स्कूल प्रबंधन को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सभी पक्षों से 13 फरवरी तक यह बताने को कहा है कि छात्र की पढ़ाई जारी रखने और उसे बोर्ड परीक्षा में शामिल कराने के लिए क्या व्यवस्था की जा सकती है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला इंदौर के लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल से जुड़ा है। यहां 9वीं कक्षा के एक छात्र पर आरोप है कि उसने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर इंस्टाग्राम पर एक प्राइवेट अकाउंट बनाया था।

इस अकाउंट पर शिक्षकों से जुड़े कुछ आपत्तिजनक मीम्स साझा किए गए थे। इसकी जानकारी मिलने पर स्कूल प्रबंधन ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए छात्र को स्कूल से निष्कासित कर दिया था।

छात्र के परिवार ने पहले इंदौर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

‘बच्चे के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर सकते’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ स्कूल के अनुशासन का नहीं, बल्कि एक बच्चे के शैक्षणिक भविष्य का भी है। अदालत ने कहा कि अनुशासन महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नाम पर किसी छात्र का भविष्य दांव पर नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने पूछा कि छात्र को बोर्ड परीक्षा में शामिल कराने के लिए क्या व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है?

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील निपुण सक्सेना ने दलील दी कि स्कूल की कार्रवाई अत्यधिक कठोर है। उन्होंने कहा, “13-14 साल के बच्चे में किसी को अपमानित करने की ‘आपराधिक मंशा’ नहीं हो सकती। अगर इस तरह के निष्कासन को सही ठहराया गया, तो यह स्कूलों को छात्रों की निजी डिजिटल जिंदगी में ताक-झांक करने का असीमित अधिकार दे देगा।”

हाईकोर्ट ने दिया था सख्त संदेश

इससे पहले इंदौर हाईकोर्ट ने छात्र को राहत देने से इनकार करते हुए कहा था कि समाज में एक सख्त संदेश जाना जरूरी है, ताकि दूसरे छात्र ऐसी गतिविधियों से दूर रहें।

हालाकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब छात्र के शिक्षा के अधिकार और स्कूल के अनुशासन के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया है। मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी को होगी, जिसमें तय होगा कि छात्र का शैक्षणिक सत्र कैसे बचाया जाए।