Supreme Court फैसला… सरकारी संसाधनों के बंदरबांट पर रोक

रामानंद तिवारी, भोपाल

संविधान निर्माताओं ने सत्ता की निरंकुशता की कल्पना शायद पहले ही कर ली थी इसलिये उन्होंने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका नामक तीन स्तंभों का प्रावधान भी रखा था। पत्रकारिता को चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता मिली। ऐसा इसलिये किया गया ताकि सत्ता निरंकुश न हो सके और आमजन तक राज्य के संसाधनों का लोकतांत्रिक रूप से समानता के आधार पर वितरण हो सके। लेकिन उन्होंने शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि कालान्तर में यही लोग अपना एक ‘विशिष्ट वर्ग’ बना लेंगे और राज्य के संसाधनों पर आमजन के बजाय स्वयं के लिये प्राथमिकता तय करने लग जायेंगे? सुप्रीम कोर्ट के हाल ही के एक फैसले में ऐसे विशेषाधिकारों को अनुच्छेद 14 यानि समानता के अधिकारों के विरुद्ध मानते हुए भूमि आवंटन रद्द कर दिया गया है।

Supreme Court ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) ने ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम की सीमा के अन्दर सांसदों, विधायकों, नौकरशाहों, न्यायाधीशों और पत्रकारों को प्राथमिक रूप से भूमि आवंटन की सुविधा देने वाले सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया और कहा कि राज्य द्वारा इस प्रकार किया जाने वाला उदारतापूर्ण वितरण ‘मनमाना’ और ‘तर्कहीन’ था। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने इस नीति को ‘अनुचित, मनमाना, भेदभावपूर्ण’ और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का बंधन करने वाला माना। इस फैसले में न्यायाधीश द्वय ने कहा है कि ‘जब सरकार विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को रियायती दरों पर भूमि आवंटित करती है, तो वह असमानता की व्यवस्था को जन्म देती है, जिससे उन्हें भौतिक लाभ मिलता है, जो आम नागरिक के लिए दुर्गम व दुर्लभ रहता है।

चीफ जस्टिस बोले- इस नीति ने असमानता को बढ़ावा दिया

यह तरजीह (प्राथमिकता देने वाला) व्यवहार यह संदेश देता है कि कुछ व्यक्ति अपने सार्वजनिक पद या सार्वजनिक भलाई की आवश्यकताओं के कारण नहीं, बल्कि केवल अपनी स्थिति के कारण अधिक के हकदार हैं। इस फैसले में आगे कहा गया है कि सरकार के तीनों अंगों के उच्च स्तर विधायक, नौकरशाह और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को इस तरह का विशेष प्राथमिकता पूर्ण व्यवहार दिया गया है। इसमें कहा गया है, पत्रकार, जिन्हें लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, को भी इसमें शामिल किया गया है। लोकतंत्र के इन चार स्तंभों से राज्य की शक्ति के मनमाने प्रयोग पर नियंत्रण और संतुलन के रूप में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है। हालांकि इस तरह के असाधारण राज्य लाभों का वितरण हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के भीतर स्वस्थ नियंत्रण और संतुलन के दृष्टिकोण को निरर्थक बना देता है। तथ्यों को मौलिक समानता के मानकों के विरुद्ध परखने के लिए, हमारा विचार है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों सांसदों, विधायकों, आई.ए.एस. अधिकारियों, पत्रकारों आदि को अन्य लोगों की तुलना में रियायती मूल मूल्य पर भूमि आवंटन के लिए एक अलग श्रेणी के रूप में नहीं माना जा सकता है। इस नीति का उद्देश्य असमानता को बनाए रखना है।’ पीठ ने इस फैसले में कहा कि इन राज्य नीतियों का मूल फैसला लिखते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने जनहित के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि इस नीति ने असमानता को बढ़ावा दिया है और संविधान में निहित वास्तविक समानता के सिद्धांतों को कमजोर किया है। इसमें सत्ता के रंग-बिरंगे प्रयोग की बू आती है, जिसके तहत नीति निर्माता अपने साथियों और उनके जैसे लोगों को मूल्यवान संसाधन दे रहे हैं, जिससे राज्य के संसाधनों के अवैध वितरण का चक्र शुरू हो रहा है। राज्य अपने सभी संसाधनों को अपने नागरिकों के लिए लिस्ट में रखता है, जिसका उपयोग व्यापक सार्वजनिक और सामाजिक हित में किया जाना है। राज्य जिसमें तीन अंग शामिल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका।

महत्वपूर्ण बातें जो विद्वान न्यायाधीशों ने कहीं

  • ऐसी प्रथाएम (सार्वजनिक संपत्तियों का अतार्किक वितरण) असंतोष को बढ़ावा देती हैं और आम नागरिकों में निराशा को बढ़ाती है तथा ऐसे लोगों का जो इन कार्यों को भ्रष्ट या अन्यायपूर्ण मानते है, लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास को खत्म करती है।
  • राज्य की इस नीति के व्यापक आर्थिक परिणाम भी हैं, जो सरकारी खजाने पर गंभीर वित्तीय प्रभाव डालती हैं। हमारा यह भी मानना है कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों को इस तरह के विशेष प्राथमिकता पूर्ण उपचार के लिए एक अलग वर्ग के रूप में नहीं माना जा सकता है।
  • यह नीति अधिक योग्य लोगों के साथ-साथ समान स्थिति वाले लोगों को समान कीमत पर भूमि तक पहुंच से रोकती है।
  • सांसदों, विधायकों, सिविल सेवकों, न्यायाधीशों, पत्रकारों और अन्य को मूल दरों पर भूमि आवंटन के लिए एक अलग श्रेणी के रूप में वर्गीकृत करना भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक था।
  • अन्त में पीठ ने निर्णय में रेखांकित किया गया कि यह नीति संविधान द्वारा निर्धारित समानता और निष्पक्षता के मानकों को पूरा नहीं करती है।

वास्तव में ट्रस्टी और एजेंट भंडार हैं जो नागरिकों के लाभ के लिए एक कार्य करते हैं और शासन करते हैं, जो इसमें लाभार्थी हैं। इस फैसले में न्यायाधीश द्वय ने तत्कालीन आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा जारी 2005 के सरकारी आदेशों को खारिज कर दिया है। साथ ही 2008 में इन समूहों को रियायती दरों पर भूमि आबंटित करने वाले आदेशों को भी खारिज कर दिया। राज्य सरकार और सहकारी समितियों के सदस्यों द्वारा दायर अपीलों की खारिज करते हुए 2010 के तेलंगाना उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा गया। इसके साथ ही निरस्त किये गये सरकारी आदेशों के तहत निष्पादित लीज डीड को भी रद्द करने के निर्देश दिये। भविष्य में भूमि का उपयोग निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों का पालन करते हुए कानून के अनुसार तेलंगाना सरकार के विवेक पर छोड़ दिया गया। फैसले में कहा गया कि भूमि आवंटन नीति में निहित मनमानी सरकार के एक आदेश में और भी अधिक परिलक्षित होती है।

‘मनमाना’ और ‘तर्कहीन’ दृष्टिकोण

फैसले में कहा गया, चुनिंदा विशेषाधिकार प्राप्त समूहों को मूल दरों पर भूमि का आवंटन एक ‘मनमाना और तर्कहीन’ दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह मनमानेपन में डूबी कार्यकारी कार्रवाई का एक क्लासिक मामला है, लेकिन यह वैधता की आड़ में यह कहकर पेश किया गया है कि नीति का प्रकट उद्देश्य समाज के योग्य वर्गों को भूमि आवंटित करना था। इसमें कहा गया है कि दिखावे से परे, राज्य सरकार की यह नीति सत्ता का दुरुपयोग है, जिसका उद्देश्य समाज के संपन्न वर्गों को लाभ पहुंचाना है, तथा आम नागरिक और सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित लोगों के समान अधिकार को अस्वीकार करना है।

शिवराज सरकार भी कर चुकी उपकृत

मध्यप्रदेश में भी पिछली शिवराज सरकार के कार्यकाल में ऐसे विशिष्ट वर्ग को रियायती दरों पर जमीनों के आवंटन तथा अन्य राज्य लाभों से उपकृत किया जा चुका है। एक पत्रिका में भी न्यायाधीश व पत्रकारों की संस्थाओं को आवासीय जमीनों को रियायती दरों पर दिये जाने का मामला उठाया जा चुका है। सरकार की छवि सुधारने वाले एक विभाग के अधिकारी भी स्वयं अथवा साथियों को पत्रकार बताकर ऐसी रियायत के लाभार्थी बने बैठे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ये आवंटन भी शून्य घोषित किये जाने चाहिये? देखना है सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है?