Madhya Pradesh High Court की इंदौर खंडपीठ में गुरुवार को इंदौर के Indore के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान मामले की जांच के लिए गठित आयोग ने अदालत के समक्ष अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। हालांकि विस्तृत और अंतिम रिपोर्ट तैयार करने के लिए आयोग ने और समय की मांग की, जिस पर कोर्ट ने उसे एक महीने का समय दे दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले की अगली सुनवाई अब 6 अप्रैल को की जाएगी। यह मामला क्षेत्र में दूषित पेयजल के कारण हुई मौतों और फैली बीमारियों को लेकर गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय बना हुआ है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच आयोग को यह निर्देश भी दिया कि वह इस मामले में एक कर्मचारी की नियुक्ति करे, जो भागीरथपुरा क्षेत्र के रहवासियों और प्रभावित लोगों से जुड़ी शिकायतों, आवेदन, दस्तावेज और सबूतों को व्यवस्थित तरीके से एकत्रित करेगा। यह कर्मचारी स्थानीय नागरिकों से मिलने वाली सभी जानकारियों को समन्वित कर आयोग तक पहुंचाने का काम करेगा, ताकि जांच में पारदर्शिता बनी रहे और प्रभावित लोगों की बात सीधे आयोग तक पहुंच सके। कोर्ट का मानना है कि इससे पीड़ित परिवारों और स्थानीय लोगों की समस्याओं को सही तरीके से दर्ज करने में मदद मिलेगी।
मामले में नगर निगम से भी महत्वपूर्ण दस्तावेज और रिकॉर्ड मांगे गए थे, लेकिन सुनवाई के दौरान सामने आया कि Indore Municipal Corporation ने अभी तक ये रिकॉर्ड जांच समिति के सामने प्रस्तुत नहीं किए हैं। इस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए निगम को निर्देश दिया कि वह 10 दिनों के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेज और रिकॉर्ड जांच आयोग के सामने पेश करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि आयोग को एक महीने के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर अदालत के समक्ष पेश करनी होगी। इस मामले को लेकर अलग-अलग सामाजिक संगठनों और नागरिकों की ओर से कई जनहित याचिकाएं भी दाखिल की गई हैं।
इससे पहले हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने इन रिपोर्टों को “आई-वॉश” यानी औपचारिकता भर करार देते हुए कहा था कि इनसे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती। कोर्ट ने कहा था कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना जाता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति Vijay Kumar Shukla और न्यायमूर्ति Alok Awasthi की खंडपीठ ने अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए “वर्बल ऑटॉप्सी” शब्द पर भी सवाल उठाए थे। अदालत ने पूछा था कि क्या यह चिकित्सा विज्ञान में मान्यता प्राप्त कोई तकनीकी शब्द है या फिर अधिकारियों द्वारा स्वयं बनाया गया शब्द है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रस्तुत रिपोर्ट भरोसेमंद प्रतीत नहीं होती और इससे पूरे मामले की सच्चाई सामने नहीं आ रही।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने प्रशासन को कई निर्देश भी दिए हैं। अदालत ने आदेश दिया है कि भागीरथपुरा क्षेत्र में प्रतिदिन पानी की गुणवत्ता की जांच की जाए और प्रभावित इलाके में नियमित रूप से स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएं। इसके अलावा डॉक्टरों की टीम को लगातार निगरानी रखने के लिए कहा गया है, ताकि लोगों को समय पर इलाज मिल सके और किसी नई बीमारी के फैलने की स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।
जांच आयोग को इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आयोग विशेष रूप से यह पता लगाएगा कि दूषित पानी के कारण कितनी मौतें हुईं, इलाके में कौन-कौन सी बीमारियां फैलीं, अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था कितनी पर्याप्त थी, और इस पूरे मामले में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है। इसके साथ ही आयोग यह भी जांच करेगा कि प्रभावित परिवारों को किस प्रकार का मुआवजा दिया जाना चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएं।
हाईकोर्ट ने जांच आयोग को व्यापक अधिकार भी प्रदान किए हैं। आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां दी गई हैं, जिसके तहत वह अधिकारियों और गवाहों को तलब कर सकता है, आवश्यक दस्तावेज मंगवा सकता है, पानी की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच करा सकता है और जरूरत पड़ने पर घटनास्थल का निरीक्षण भी कर सकता है। अदालत का मानना है कि इन अधिकारों के जरिए आयोग निष्पक्ष और प्रभावी जांच कर सकेगा और इस गंभीर मामले की सच्चाई सामने लाने में मदद मिलेगी।