केंद्र सरकार ने बजट 2026 के जरिए ट्रांजेक्शन टैक्स में बढ़ोतरी कर भारत के डेरिवेटिव मार्केट की पूरी संरचना को प्रभावित कर दिया है। इक्विटी डेरिवेटिव्स पर सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) बढ़ाए जाने से फ्यूचर और ऑप्शंस ट्रेडिंग पहले की तुलना में कहीं ज्यादा महंगी हो गई है। अब मुनाफा हो या नुकसान, हर सौदे पर ट्रेडर्स को अधिक टैक्स चुकाना होगा। बाजार ने इस फैसले पर तुरंत प्रतिक्रिया जरूर दी, लेकिन इसका वास्तविक असर तब समझ में आता है जब इसकी गणितीय गणना की जाए।
सरकार का तर्क: सट्टेबाजी पर लगाम जरूरी
सरकार ने टैक्स बढ़ाने के फैसले को सही ठहराते हुए भारत के विशाल डेरिवेटिव बाजार का हवाला दिया है। मौजूदा समय में फ्यूचर और ऑप्शंस ट्रेड का कुल वॉल्यूम भारत की जीडीपी से करीब 500 गुना ज्यादा बताया जा रहा है। लगभग 300 लाख करोड़ रुपए की अनुमानित जीडीपी के मुकाबले डेरिवेटिव कारोबार का आकार बेहद बड़ा है। नीति निर्माताओं का मानना है कि यह कारोबार धीरे-धीरे सट्टेबाजी का रूप ले चुका है और इसे नियंत्रित करने के लिए ट्रेडिंग की लागत बढ़ाना जरूरी है। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि डेरिवेटिव केवल सट्टा लगाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ये हेजिंग, सही प्राइस डिस्कवरी और कैश मार्केट को लिक्विडिटी देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
ऑप्शंस ट्रेडिंग पर बढ़ा खर्च
ऑप्शंस ट्रेडिंग में भी अब पहले से ज्यादा लागत आएगी, हालांकि इसकी टैक्स गणना का तरीका अलग है। ऑप्शंस में STT पूरे कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू पर नहीं, बल्कि केवल प्रीमियम वैल्यू पर लगता है। उदाहरण के तौर पर, यदि निफ्टी कॉल ऑप्शन 100 रुपए के प्रीमियम पर ट्रेड हो रहा है और लॉट साइज 65 है, तो कुल प्रीमियम वैल्यू 6,500 रुपए होगी। पहले इस पर 0.10 फीसदी STT लगता था, यानी प्रति लॉट 6.50 रुपए टैक्स। बजट के बाद STT बढ़कर 0.15 फीसदी हो गया है, जिससे टैक्स बढ़कर 9.75 रुपए प्रति लॉट हो गया। भले ही यह बढ़ोतरी रकम में छोटी दिखे, लेकिन प्रतिशत के हिसाब से STT में करीब 50 फीसदी का इजाफा हुआ है, जो बार-बार या कई लॉट में ट्रेड करने वालों पर भारी पड़ेगा।
फ्यूचर्स ट्रेडिंग में लागत में तेज उछाल
फ्यूचर्स ट्रेडिंग पर इसका असर और भी ज्यादा है। निफ्टी फ्यूचर्स का एक लॉट लगभग 16.13 लाख रुपए के नोशनल वैल्यू का प्रतिनिधित्व करता है। फ्यूचर्स में STT पूरे टर्नओवर पर लगता है। बजट से पहले इस पर 0.02 फीसदी STT था, जिससे एक लॉट पर करीब 325 रुपए टैक्स देना पड़ता था। अब STT बढ़कर 0.05 फीसदी हो गया है, जिससे वही टैक्स बढ़कर लगभग 817 रुपए प्रति लॉट हो गया है। यानी हर फ्यूचर्स ट्रेड पर केवल STT के रूप में करीब 500 रुपए अतिरिक्त खर्च करना होगा।
ब्रेक-ईवन पॉइंट हुआ दूर
ट्रेडर्स आमतौर पर टैक्स को रुपए की बजाय इंडेक्स पॉइंट्स में देखते हैं। पहले करीब 325 रुपए के STT की भरपाई के लिए निफ्टी में लगभग 5 अंकों की मूवमेंट काफी होती थी। अब करीब 817 रुपए के STT को कवर करने के लिए निफ्टी में 12 से 13 अंकों की चाल जरूरी हो गई है। इसमें ब्रोकरेज, एक्सचेंज चार्ज, GST और अन्य कानूनी शुल्क शामिल नहीं हैं, जो ब्रेक-ईवन को और ऊपर ले जाते हैं। इसका सीधा असर शॉर्ट टर्म और इंट्राडे ट्रेडर्स पर पड़ेगा, जो छोटे प्राइस मूवमेंट पर निर्भर रहते हैं।
रणनीतियों पर पड़ेगा असर
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ी हुई ट्रांजेक्शन कॉस्ट से कई पुरानी ट्रेडिंग रणनीतियां अब कम प्रभावी हो जाएंगी। जो रणनीतियां पहले कम मार्जिन पर भी मुनाफा दे देती थीं, अब उनके लिए बड़े प्राइस मूवमेंट की जरूरत होगी। इससे हर ट्रेड का रिस्क-रिवार्ड समीकरण बदल जाएगा और कई छोटे ट्रेडर्स के लिए ट्रेडिंग करना मुश्किल हो सकता है।
लिक्विडिटी और विदेशी निवेश को लेकर चिंता
जानकारों ने यह भी आशंका जताई है कि ट्रांजेक्शन टैक्स में वृद्धि से बाजार की लिक्विडिटी कम हो सकती है। SAMCO ग्रुप के जिमीत मोदी के अनुसार, ऐसे समय में जब भारत वैश्विक पूंजी आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है, ट्रेडिंग को महंगा बनाना गलत संकेत दे सकता है। डेरिवेटिव बाजार न केवल जोखिम प्रबंधन का जरिया है, बल्कि पूरे इक्विटी बाजार को लिक्विडिटी भी प्रदान करता है।
एफआईआई के लिए भारत कम आकर्षक?
विदेशी निवेशकों को लेकर भी चिंताएं बढ़ गई हैं। वैश्विक अनिश्चितता और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण एफआईआई पहले ही भारतीय बाजार से दूरी बना रहे हैं। ऐसे में हाई ट्रांजेक्शन टैक्स से रिटर्न और घट सकता है, जिससे डेरिवेटिव आधारित ग्लोबल रणनीतियों के लिए भारत की आकर्षण क्षमता कमजोर पड़ सकती है। कुल मिलाकर, बजट 2026 का यह फैसला भारतीय डेरिवेटिव बाजार की दिशा और दशा दोनों पर दूरगामी असर डाल सकता है।