देश के चुनाव आयोग ने सभी राज्यों को पत्र भेजकर बूथ लेवल ऑफिसर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने कहा है कि यदि कोई बीएलओ कदाचार करता है, आयोग के आदेशों की अनदेखी करता है, नियमों का उल्लंघन करता है, चुनावी कार्यों में लापरवाही बरतता है या ऐसा आचरण करता है जिससे ईमानदारी और निष्पक्षता पर असर पड़े, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
निलंबन से लेकर एफआईआर तक की कार्रवाई संभव
चुनाव आयोग के अनुसार, ऐसे मामलों में जिला निर्वाचन अधिकारी बीएलओ को निलंबित कर सकता है और संबंधित विभागीय प्राधिकरण को अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करेगा। यदि मामला आपराधिक कदाचार से जुड़ा हो, तो मुख्य निर्वाचन अधिकारी की अनुमति से एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत और समयबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी।
डीईओ और ईआरओ की रिपोर्ट पर होगा फैसला
मुख्य निर्वाचन अधिकारी स्वयं संज्ञान लेकर या जिला निर्वाचन अधिकारी एवं निर्वाचक पंजीयन अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई कर सकते हैं। इसके तहत निलंबन, विभागीय जांच या एफआईआर दर्ज कराने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। सीईओ द्वारा लिया गया निर्णय संबंधित डीईओ के माध्यम से लागू होगा और आयोग द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार तत्काल आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
बिना अनुमति नहीं होगा कार्रवाई का समापन
चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी की पूर्व सहमति के बिना किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई को समाप्त नहीं किया जाएगा। साथ ही, की गई सभी कार्रवाई की जानकारी निर्वाचन आयोग को अनिवार्य रूप से दी जाएगी।
पश्चिम बंगाल मामले से बढ़ी सख्ती
गौरतलब है कि हाल ही में पश्चिम बंगाल में बीएलओ और चुनाव से जुड़े अधिकारियों की कथित अनुशासनहीनता को लेकर चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के रुख पर नाराजगी जताई थी और मुख्य सचिव से स्पष्टीकरण भी मांगा था। इसी बीच राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद जारी है। रघुनाथगंज से विधायक और राज्य के विद्युत मंत्री अखरुज्जमान ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर साजिश रची जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटते हैं और अंतिम सूची जारी होने के दिन आक्रोश फैलता है, तो इसकी जिम्मेदारी क्या चुनाव आयोग की होगी?