भारत में गुड़ी पड़वा का पर्व विशेष रूप से हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है, और यह हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक होता है। इस दिन से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ भी होता है। गुड़ी पड़वा के पर्व को देशभर के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न नामों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस पर्व को कहां-कहां मनाया जाता है और इसके साथ जुड़ी मान्यताओं के बारे में
1. महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मराठी लोग अपने घरों के बाहर “गुड़ी” लगाते हैं, जो एक बांस के डंडे पर उल्टा रखा गया कलश होता है, जिसे आम और नीम की पत्तियों, फूलों और रंगीन कपड़े से सजाया जाता है। यह विजय और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
2. गोवा
गोवा और कोंकण क्षेत्र में भी गुड़ी पड़वा मनाया जाता है, जहां इसे “संवत्सर पाडवो” के नाम से जाना जाता है। यहां भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ लोग इस पर्व का उत्सव मनाते हैं।
3. कर्नाटक
कर्नाटक में इस पर्व को ‘युगादी’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग पंचांग पढ़ते हैं, पूजा करते हैं, और नए साल के लिए अच्छे विचारों और संकल्पों के साथ शुरुआत करते हैं।
4. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गुड़ी पड़वा को उगादी के रूप में मनाया जाता है। यहां भी विशेष पकवान बनाए जाते हैं और परिवार के सदस्य मिलकर इस पर्व का उल्लासपूर्वक आनंद लेते हैं।
5. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
इन राज्यों में गुड़ी पड़वा खासतौर पर उन क्षेत्रों में मनाया जाता है, जहां मराठी समुदाय की अच्छी खासी आबादी है। यहां परंपराओं के अनुसार, विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
गुड़ी पड़वा से जुड़ी परंपराएं:
1. गुड़ी की पूजा
गुड़ी, यानी एक बांस पर उल्टा रखा हुआ कलश, जिस पर चेहरे की आकृति उकेरी जाती है और रेशमी वस्त्र लपेटा जाता है, यह विजय और समृद्धि का प्रतीक है। यह गुड़ी घर के मुख्य द्वार या छत पर फहराई जाती है, और यह नया आरंभ का संकेत देती है।
2. नीम और मिश्री का सेवन
गुड़ी पड़वा के दिन नीम की कोमल पत्तियां और मिश्री खाने की परंपरा है। यह न केवल परंपरा है, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है। यह शरीर को गर्मी के मौसम के लिए तैयार करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
3. विशेष पकवान – पूरन पोली
गुड़ी पड़वा के दिन विशेष रूप से पूरन पोली बनाई जाती है, जो चने की दाल और गुड़ से बनी एक पारंपरिक मिठाई है। यह न केवल स्वादिष्ट होती है, बल्कि शरीर को ऊर्जा और पोषण भी देती है। यह त्यौहार की मिठास को और बढ़ा देती है।
गुड़ी पड़वा का पर्व धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है और इसके हर पहलू में जीवन की नई शुरुआत और समृद्धि की भावना झलकती है।