सरकार देश की निर्यात नीति को और प्रभावी बनाने के लिए एक्सपोर्ट प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स (EPI) में बदलाव की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार, पुराने और अप्रासंगिक मानकों को इंडेक्स से हटा दिया गया है, जिनमें एक्सपोर्ट कमिश्नर की जरूरत जैसे पैरामीटर शामिल थे। वहीं, नए इंडेक्स का अंतिम रूप अगले साल जारी होने तक तय नहीं हुआ है। सरकार का उद्देश्य इंडेक्स को अधिक व्यावहारिक और वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना है, ताकि राज्यों को निर्यात बढ़ाने में वास्तविक मदद मिल सके।
वैश्विक बाजार की अस्थिरता का असर
सरकार ने माना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार का माहौल अस्थिर है। खासकर अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50% टैरिफ लागू किया, जिससे भारत को अपने निर्यात के लिए नए बाजार खोजने पड़े। इस फैसले का असर कई उद्योगों पर पड़ा और सरकार ने निर्यात को सिर्फ अमेरिका पर निर्भर न रखते हुए एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका जैसे नए बाजारों पर फोकस बढ़ाया। यह रणनीति भारत के निर्यात को विविध बनाकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मदद करेगी।
डेटा सिस्टम को और सुदृढ़ किया जाएगा
सरकार अब नीति निर्माण के लिए विस्तृत और सटीक आंकड़ों पर जोर दे रही है। इसके लिए सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मिलकर सेवाओं के क्षेत्र से जुड़े डिसएग्रीगेटेड डेटा तैयार कर रहे हैं। इससे यह पता चल सकेगा कि किस सेक्टर से कितना योगदान आ रहा है और कहां सुधार की जरूरत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे नीति निर्माण और योजना कार्यान्वयन और प्रभावी होंगे।
नए इंडेक्स से राज्यों को मिलेगा लाभ
सरकार का उद्देश्य है कि नया एक्सपोर्ट प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स राज्यों की वास्तविक स्थिति को सही ढंग से दर्शाए। इसमें लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, पॉलिसी सपोर्ट और इंडस्ट्री रेडीनेस जैसे महत्वपूर्ण फैक्टर्स को अधिक महत्व दिया जाएगा। इससे राज्यों को अपनी ताकत और कमजोरियों का बेहतर विश्लेषण करने में मदद मिलेगी।
निर्यात रणनीति को नई दिशा
कुल मिलाकर, सरकार का फोकस अब बदलते वैश्विक हालात के अनुसार भारत की निर्यात रणनीति को मजबूत करने और देश की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी बढ़ाने पर है। नए इंडेक्स के जरिए नीति निर्माताओं को बेहतर दिशा मिलेगी और राज्यों को अपने निर्यात लक्ष्यों को पूरा करने में सहूलियत होगी।