प्रखर – वाणी
गणतंत्र दिवस पर दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी को पद्म भूषण मिला…दुनिया भर के असंख्य भक्तों की आस्थाओं का रोम रोम खिला…वात्सल्य और परमार्थ की जीवंत प्रतिमूर्ति दीदी माँ है…बेसहारा अबोधों को जीवन का बोध करवाती दीदी माँ है…तार – तार होते रिश्तों को एक माला में पिरोती दीदी माँ है…जन्म लेते ही टूटी आस व सांस को खिलखिलाते संसार का दर्शन करवाती दीदी माँ है…वाणी की गर्जना से दुष्टों का संहार और शत्रुओं को हुंकार भर चुनौती का साहस रखती दीदी माँ है…अपने धाम में बसी एक – एक बालाओं को जिगर के टुकड़े से भी ज्यादा दुलार देती दीदी माँ है…
माता व मौसी के फर्ज को साकार स्वरूप आकार देती दीदी माँ है…अपने गुरुदेव को अपना सर्वस्व अर्पित कर उनके चरणों में नतमस्तक दीदी माँ है…दुनिया भर को अपने कदमों से नापकर हिन्दू धर्म व सनातन की पताका फहराती दीदी माँ है…अपने शिष्यों के हर लम्हें को दूरदृष्टिता से निहारकर उनको मुख्यधारा में लाती दीदी माँ है…ऐसी विभिन्न गुणों की साकार , साक्षात , विलक्षण शक्ति स्वरूपा दीदी माँ…जिनको पद्म भूषण तो महज प्रतीकात्मक है वो तो इससे भी बढ़कर है समाज की दिव्य गरिमा…
बेसहारा मुक्त समाज की कल्पना को कर्मक्षेत्र का लक्ष्य बनाकर दीदी माँ सदैव रहती जिनके साथ…अपने विचारों से कहती रही ‘विश्वनाथ’ और ‘रघुनाथ’ की धरती पर हो कैसे कोई अनाथ…जहां सचमुच ममता साक्षात गोद पसारकर बैठी हो वही ईश्वर का धाम…दीदी माँ ने जिस सामाजिक प्रकल्प का बीड़ा उठाया उसका नाम वात्सल्य ग्राम…जिनकी दृष्टि में वो हर काम सफल व सार्थक हो सकते हैं जो लगते हमें विहंगम…भारत में जन्म लेकर जिन्होंने आचरण रखा वसुधैव कुटुम्बकम…ऋतम्भरा सुनकर ही रोंगटे खड़े होने से लेकर वात्सल्य तक का पैगाम है…
राष्ट्र , समाज व संस्कृति से जुड़े असम्भव काम को सम्भव करता नाम है…समाज में बेसहारा व बुजुर्ग महिलाओं के उत्थान का दीदी माँ के यहां प्रकल्प है…धरती से अनाथ शब्द ही विलोपित हो जाये यही जिनका संकल्प है…दीदी माँ जिन्होंने अपने स्वभाव और भूमिका के पृथक आयाम स्थापित किये…वक्त पड़ने पर तेवर और भूमिका बदलकर कथा से वात्सल्य तक के समाज को जेवर दिए…ओजस्वी वाणी से क्रांति दी तो भजनों और प्रेममय विचारों से शांति दी…सोये हुए समाज को जाग्रत करने का कार्य किया तो विलुप्त जीवन की डोर को कांति दी…
कूड़ेदान में मिले शिशु को जिंदगी और मौत से जूझते बचाया…नया जीवनदान दे पोषित किया फिर उनका ब्याह तक रचाया…ऐसे असंख्य अनाथ बच्चों को कभी अनाथ शब्द का भी एहसास नहीं होने दिया…कोई इस तरह की चर्चा भी न कर सके ऐसे लोगों को पास नहीं होने दिया…लालन – पालन शिक्षा – दीक्षा उत्कृष्ट और वात्सल्यमय रही…मुझसे मिली बेटियों ने दीदी माँ के प्रेम की अनेक बातें कही…एक अनुभव मेरा यह भी रहा जब उच्च अध्ययन हेतु वात्सल्य ग्राम की भांजियों को दीदी माँ ने स्वयं मुझसे चर्चाकर भेजा…भावुक दशा , रुदन भरी जुबान , झरझर आंसुओं की धार के साथ कहा आपको सौंप रही हूं मेरा कलेजा…
वात्सल्य ग्राम में शाही सुख पाने वाली बेटियों को यहां व्यवस्था ने ज्यों ही सताया…दीदी माँ ने तुरंत कहा आप तो शीघ्र भेज दो और पुनः उन्हें अपने पास बुलाया…ये सच्चे अनुभव इस बात का पैमाना है कि पद्म भूषण तो क्या दुनिया का हर पुरस्कार उनके लिए बौना है…उनकी सच्चाई यही है कि अपनी बेटियों के लाड में दीदी माँ कई बार बन जाती खिलौना है…वात्सल्य स्वरूपा दीदी माँ के भाल पर तेजस्विता का लगा चन्दन है…पद्म भूषण अवार्ड पर साध्वी ऋतम्भरा जी का वन्दन है अभिनन्दन है…