मंदसौर की इस घटना ने कर दिया झकझोर: शिक्षक बेटे ने 80 साल की मां को बस स्टैंड पर छोड़ दिया

Mandsaur News: मध्य प्रदेश के मंदसौर से एक दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया है, जिसमें एक 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला बस स्टैंड पर रोती-बिलखती नजर आ रही हैं।

आरोप है कि महिला के शिक्षक बेटे ने अपनी पत्नी के दबाव में आकर उन्हें लावारिस छोड़ दिया। यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और इसने समाज में बुजुर्गों की सुरक्षा और पारिवारिक मूल्यों पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

यह घटना न केवल एक परिवार के आंतरिक कलह को दर्शाती है, बल्कि यह समाज के नैतिक पतन की ओर भी इशारा करती है। सवाल यह उठता है कि क्या हमारे भावनात्मक बंधन इतने कमजोर हो गए हैं कि जन्म देने वाली माँ भी बोझ लगने लगी है?

वीडियो में छलका मां का दर्द

वायरल वीडियो में, बुजुर्ग महिला अपनी पीड़ा बयां कर रही हैं। उन्होंने बताया कि उनके बेटे सुरेश शर्मा, जो कि एक शिक्षक हैं, और बहू ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया। इस वजह से उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। महिला रोते हुए कहती हैं कि अब वह अपनी बेटी के घर धमना जा रही हैं। उनकी बेबसी और अकेलापन देखकर किसी का भी दिल पसीज जाएगा।

एक शिक्षक, जिसे समाज का निर्माता कहा जाता है, जब अपनी ही जननी के प्रति ऐसी संवेदनहीनता दिखाए तो यह गहरी चिंता का विषय है। वीडियो में महिला का दर्द और हताशा साफ झलक रही है, जो आज समाज में कई बुजुर्गों की असुरक्षित स्थिति को बयां करती है।

सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा, कार्रवाई की मांग

वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। यूजर्स ने बेटे के इस कृत्य की कड़ी निंदा की और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। कई लोगों ने इसे सामाजिक मूल्यों का पतन बताया।

“जिस ‘कलेजे के टुकड़े’ को पाला, वही बुढ़ापे में कसाई बन गया। सिस्टम की नींद कब खुलेगी? उस बेटे की नौकरी और समाज में स्थिति पर सवाल उठना चाहिए। सिर्फ रेस्क्यू काफी नहीं है, उस परिवार पर FIR दर्ज होनी चाहिए ताकि यह एक नजीर बन सके।” — एक यूजर ने लिखा

एक अन्य यूजर ने एक माँ के बलिदान को याद करते हुए टिप्पणी की, “एक मां दर्द, आशा और अथाह बलिदान के साथ एक बच्चे को इस दुनिया में लाती है। जब वह खुद नहीं खा सकती, तो उसे खिलाती है… और फिर भी, आज हम एक मां को बस स्टैंड पर बेबस खड़ा देखते हैं।”

यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने बुजुर्गों को वह सम्मान और सुरक्षा दे पा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं। प्रशासन और समाज को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी माता-पिता को इस तरह की पीड़ा से न गुजरना पड़े।