China पर भरोसा करना यानी पैर पर कुल्हाड़ी मारना


लेखक
डॉ हिदायत अहमद खान

आज वही चीन ( China ) एक बार फिर अपना असली चेहरा दिखाने को तैयार दिख रहा है। दरअसल इस दुनियां की जन्नत कहे जाने वाले हमारे जम्म-कश्मीर को लेकर चीन ने पाकिस्तानी राग के साथ अपना बेसुरा राग मिलाने जैसा काम कर दिखाया है। अब पाकिस्तानी-चीनी भाई-भाई के नारे बुलंद करते ये दोनों ही मुल्क भारत के खिलाफ जहर उगलने का काम कर रहे हैं।

China और पाक ने कश्मीर मुद्दे पर कार्रवाई का विरोध किया

पाक और चीन ( China ) ने शनिवार को ही संयुक्त बयान में दक्षिण एशिया में कश्मीर सहित सभी लंबित मुद्दों के समाधान के लिए किसी भी एकतरफा कार्रवाई का विरोध करने का एहद किया है। यहां समझ लें कि पाकिस्तान के लिए ऐसा इसलिए भी जरुरी है क्योंकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ चीन यात्रा पर हैं। ऐसे में यदि पीएम शहबाज कश्मीर की बात नहीं करते तो वो अपने आकाओं और रणनीतिकारों के सामने कौन सा मुंह लेकर जाते और ऐसे में तो वो जवाबदेह बन जाते। उनकी मजबूरी तो समझ में आती है, लेकिन चीन और उनके रणनीतिकारों को क्या हो गया है, जो भारत के खिलाफ इस कदर जहर उगलने को बाध्य हो रहे हैं।
कहते हैं दो लोगों के रिश्ते तभी तक चलते हैं, जब तक कि दोनों के दरमियां एक भरोसा कायम है। जहां किसी एक का भी भरोसा टूटा, रिश्ता लंगड़ा-लूला, गूंगा-बहरा यानी कि अपंगता को प्राप्त हो जाता है। ऐसा रिश्ता बहुत दिनों तक ढोया नहीं जा सकता। इसलिए वक्त से पहले दरारों को भरने और किसी प्रकार का कोई भ्रम पैदा न हो, इसकी कोशिशें भी करते रहने की सलाह दी जाती है। बहरहाल यहां बात हम पारिवारिक पति-पत्नी वाले रिश्तों की नहीं कर रहे बल्कि दो देशों के बीच बनने वाले प्रगाढ़ रिश्तों की कर रहे हैं। याद दिलाते चलें कि जिस पड़ोसी की बात हम करने जा रहे हैं, उससे हमारे रिश्ते पहले कभी भाई-भाई के रहे हैं। जब भरोसा परवान चढ़ा और तत्कालीन सरकार ने हर तरह के रास्ते खोलने और करीबी रिश्तों में आने की बात कही तो सीमा पार से उसी ने एक बड़ा धोखा दिया और हिंदी-चीनी भाई-भाई वाले रिश्ते पलभर में ही जमींदोज हो गए।
चीन तो पाकिस्तान की तरह राजनीतिक और आर्थिक संकट के दौर से तो नहीं गुजर रहा है। उसे तो सच बोलना चाहिए और सच का ही साथ देना चाहिए, लेकिन वह ऐसा जानबूझ कर करता है, ताकि बेमतलब दबाव बनाया जा सके और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को दबाने और अपनी मर्जी से कुछ और गलत कार्यों को करने का रास्ता बना सके। गौरतलब है कि दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद शहबाज शरीफ अपनी चार दिवसीय चीन यात्रा पर थे, जो कि अब समाप्त हो चुकी है, लेकिन इस दौरान वो अपने मकसद को पाने में सफल रहे हैं। दरअसल इस यात्रा से चीनी निवेश और सहायता को बढ़ाने का मकसद तो था सो था लेकिन उन्हें यह भी दिखलाना था कि चीन उनके साथ हर स्थिति में खड़ा हुआ है। एक तरफ पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है तो दूसरी तरफ आतंकवादी गतिविधियों के चलते सुरक्षा दृष्टि से भी गंभीर संकट देश में उत्पन्न हो गया है। अनेक चीनी अधिकारी पाकिस्तान में निर्माण कार्य करते हुए मारे जा चुके हैं, जिसका जवाब पाकिस्तान सरकार को देते नहीं बना है।
अत: लीपापोती करते हुए कार्य को आगे बढ़ाने और अधिक से अधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करने चीन पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने लगे हाथ कश्मीर का मसला उठाकर अपने आकाओं को भी खुश करने जैसा काम कर दिखाया है। गौर करने वाली बात तो यह भी है कि एक तरफ भारत जैसे बड़े बाजार को चीन खोना नहीं चाहता और दूसरी तरफ वह यह भी नहीं चाहता है कि भारत के रिश्ते किसी और देश से बेहतर हों। ऐसे में वह आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देशों को आर्थिक मदद पहुंचा कर भारत के खिलाफ एक षडयंत्र रचने का काम करता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह संभवत: उसकी नीति और नीयत में विद्यमान है। इसलिए लगातार यह कहा जाता रहा है कि भारत अपनी विदेश नीति के तहत दूसरे देशों से संबंध बनाए। सच्चे दोस्तों से बराबर मेल-जोल रखे और नए रिश्ते बनाने या व्यापार शुरु करने से पहले यह जान ले कि ऐसा करने से हमारे पुराने दोस्तों को किसी तरह का कोई आघात तो नहीं लगने वाला है। पिछले कुछ सालों में ऐसा देखने को मिला है कि व्यापार के नाम पर हमने अपने शुभचिंतक मित्र देशों से दूरी बना ली है, जिस कारण अब वो देश सिर उठाने लगे हैं जो पहले कभी हमारी तरफ दीन-हीन भावना के साथ कातर नजरों से देखते रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम किसी गुट के हिस्सेदार नहीं हैं। हम तटस्थ रहते हुए भी विश्व शांति और समृद्धि के लिए बेहतर कार्य कर रहे थे और आगे भी करते रह सकते हैं।
रेखांकित करने वाली बात तो यह भी है कि हमारे देश की सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। नीति और आचरण के कारण ही पाकिस्तान जैसे देश की आवाम भी हमारे साथ बेहतर संबंध बनाने की सदा से हिमायती रही है। यह अलग बात है कि पाकिस्तान के कट्टर रणनीतिकार और लोकतंत्र पर सदा हावी रहने वाली सेना कभी नहीं चाहेगी कि भारत से उनके देश के संबंध बेहतर हों। इसलिए पाकिस्तान के नेता पूरी दुनियां में घूम-घूम कर भारत के खिलाफ जहर उगलने का काम करते हैं। बावजूद इसके चीन नासमझ बनते हुए पाकिस्तान के राग में अपना राग मिलाता है तो यह भारत के लिए सोचने की बात है कि वह उसके साथ भी कैसा व्यवहार करे, ताकि वह भी कहीं और कुछ बोलने के लायक ही न रहे। दरअसल पाकिस्तान और चीन ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया है, जिसे हमारा देश पूरी तरह खारिज करता है।
इस बयान में कहा गया है कि चीन और पाकिस्तान दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने के महत्व, सभी लंबित विवादों के समाधान की आवश्यकता तथा किसी भी एकतरफा कार्रवाई के विरोध को रेखांकित करते हैं। इसके साथ ही कहा गया है कि पाकिस्तानी पक्ष ने चीनी पक्ष को जम्मू-कश्मीर की स्थिति के नवीनतम घटनाक्रमों से अवगत कराया है। चीनी पक्ष ने दोहराया है कि जम्मू-कश्मीर विवाद इतिहास से उपजा है और इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, प्रासंगिक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और द्विपक्षीय समझौतों के अनुसार उचित और शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जाना चाहिए। इस तरह से चीन ने संयुक्त बयान के जरिए कश्मीर मसले को खड़ा कर उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हवा देने का काम किया है, जिसकी कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए। अंतत: चीन किसी का सगा नहीं हो सकता, यह बात भारत बहुत पहले जान चुका है और अब पाकिस्तान को समझ में आने वाला है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह के घटनाक्रम घटित हो रहे हैं, उससे चीन कभी भी पलटी मार कर पाकिस्तान को भी लपेटे में ले सकता है, क्योंकि तब उसके लिए अफगानिस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा, जिसे वह नजरअंदाज किए बैठा है।
(ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)