त्योहार से पहले मजदूर बेहाल, 36 लाख कामगारों की मजदूरी लंबित, कब आएगा पैसा?

मध्यप्रदेश में ग्रामीण आजीविका की रीढ़ मानी जाने वाली मनरेगा, जिसे अब केंद्र स्तर पर “वीबी जीराम जी” के नाम से संचालित किया जा रहा है, आर्थिक संकट से जूझ रही है। रोज मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाले लाखों श्रमिकों को महीनों से उनका मेहनताना नहीं मिल पाया है। प्रदेश में काम कर चुके 36 लाख से अधिक मजदूरों की लगभग 575.81 करोड़ रुपये की मजदूरी बकाया है। यह केवल श्रमिकों की मजदूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्माण कार्यों में उपयोग की गई सामग्री का भी 819.04 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है। कुल मिलाकर यह राशि हजारों करोड़ के करीब पहुंच रही है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है। त्योहारों का समय होने के बावजूद मजदूरों के हाथ खाली हैं और होली जैसे पर्व की खुशियां भी फीकी पड़ती नजर आ रही हैं।

विधानसभा के बजट सत्र में यह मुद्दा जोर-शोर से उठा। विधायक बाला बच्चन के प्रश्न के लिखित उत्तर में श्रम एवं पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल ने स्पष्ट किया कि मजदूरी और सामग्री भुगतान की प्रक्रिया केंद्र और राज्य सरकार से प्राप्त होने वाली राशि पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि यह एक सतत प्रक्रिया है और बकाया भुगतान की कोई निश्चित समय-सीमा बताना संभव नहीं है। मंत्री के अनुसार 31 मार्च 2025 तक वित्तीय वर्ष 2023-24 की 43.74 करोड़ रुपये तथा 2024-25 की 878.11 करोड़ रुपये की राशि, कुल 921.85 करोड़ रुपये, भारत सरकार से प्राप्त होना शेष है। यानी जब तक केंद्र से धनराशि नहीं आएगी, तब तक भुगतान अटका रहेगा।

राज्य सरकार ने भी यह स्पष्ट किया कि केंद्र से धन जारी कराने के लिए मध्यप्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद की ओर से पिछले दो वर्षों में चार बार पत्राचार किया गया है। शुरुआती दौर में उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा न होने के कारण राशि अटकी रही, लेकिन बाद में आवश्यक प्रमाणपत्र भी भेज दिए गए। इसके बावजूद केंद्र से फंड जारी नहीं हुआ। राज्य की वित्तीय स्थिति पहले से दबाव में है और उसके पास इतनी अतिरिक्त राशि उपलब्ध नहीं है कि वह अपने स्तर पर सारा बकाया चुका सके। इसलिए मजदूरों और सप्लायरों को भुगतान केंद्र से धन मिलने के बाद ही संभव बताया जा रहा है।

सदन में इस विषय पर बहस के दौरान विधायक सिद्धार्थ सुखलाल कुशवाहा ने भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि योजना का नाम बदलना एक अलग विषय है, लेकिन अब 60:40 के केंद्र-राज्य अंशदान मॉडल के तहत राज्य सरकार को 40 प्रतिशत राशि जुटानी होगी। प्रदेश पहले से कर्ज के बोझ तले दबा है, ऐसे में वह यह हिस्सा कैसे वहन करेगा? यदि राज्य अपना अंश नहीं दे पाएगा तो योजना के तहत रोजगार सृजन भी प्रभावित होगा। मनरेगा का मूल उद्देश्य गांवों में रोजगार उपलब्ध कराकर पलायन रोकना था, लेकिन मौजूदा हालात में ग्रामीणों का शहरों की ओर रुख करना तय माना जा रहा है।

स्थिति केवल मजदूरों तक सीमित नहीं है। पिछले एक वर्ष से पर्याप्त बजट आवंटन न होने के कारण निर्माण कार्यों में सामग्री उपलब्ध कराने वाले सप्लायरों के करोड़ों रुपये भी फंसे हुए हैं। वे विभागीय कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन भुगतान को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा। कई छोटे ठेकेदार और सप्लायर आर्थिक संकट में आ गए हैं। मजदूरों के साथ-साथ ये कारोबारी भी गंभीर परेशानी झेल रहे हैं। विभागीय अधिकारी भी केंद्र से राशि जारी होने का इंतजार करने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह रुकने से बाजार पर भी असर दिखने लगा है। जिन परिवारों की रोजी-रोटी मनरेगा पर निर्भर है, वे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उधार लेने को मजबूर हैं। त्योहारों, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक समन्वय की कमी को दर्शाती है, बल्कि नीति स्तर पर गंभीर पुनर्विचार की मांग भी करती है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो ग्रामीण रोजगार गारंटी की मूल भावना कमजोर पड़ सकती है और इसका दूरगामी सामाजिक-आर्थिक असर देखने को मिल सकता है।